Maha Shivratri – March 10th

Maha Shivaratri, the night of the worship of Shiva, occurs on the 14th night of the new moon during the dark half of the month of Phalguna. It falls on a moonless February night, when Hindus offer special prayer to the lord of destruction. ……Read More

Upcoming Festivals – व्रत-त्योहार

Jan. 13 - Lohri                              Jan. 14 - Makar Sanhranti       Jan. 26 - Republic Day

Feb. 15 - Basant Panchami         Mar. 10 - Maha Shivratri          Mar. 26 – Holika Dahain

Mar. 27 - Dulhandi                       Apr. 11 - Navratra’s Begin       Apr. 18 – Durga Ashtami

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लोहड़ी (Lohri)

मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व 13 जनवरी को हर वर्ष लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा , दिल्ली, जम्मू काश्मीर और हिमांचल में धूम धाम तथा हर्षो लाश के साथ मनाया जाता हैं। पंजाब कृषि प्रधान राज्य है, वहां लोहड़ी किसानों, जमींदारों एवं मजदूरों की मेहनत का पर्याय है। वहां इसे सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाते हैं।

लोहड़ी शब्द लोही से बना है, जिसका अभिप्राय है वर्षा होना, फसलों का फूटना।  इस तरह यह त्योहार बुनियादी तौर पर मौसम के बदलाव तथा फसलों के बढ़ने से जुड़ा है। इसी समय से सर्दी भी घटने लगती है। इसलिए किसान इस त्योहार के माध्यम से इस सुखद, आशाओं से भरी परिस्थितियों को हर्षो लाश के साथ  मनाते हैं।

इस दिन प्रत्येक घर में मूंगफली, रेवड़ियां, चिवड़े, गजक, भुग्गा, तिलचौली, मक्की के भुने दाने, गुड़, फल इत्यादि खाने और बांटने के लिए रखे जाते हैं। ये सारी चीजें इसी मौसम की उपज होती हैं और अपनी तासीर से शरीर को गर्मी पहुंचाती हैं।

त्योहार आने से कुछ ही दिन पूर्व बच्चों के विशेष झुंड शाम होते ही एक प्रचलित गीत के साथ घर-घर में लोहड़ी मांगने जाते हैं। लोहड़ी गीत गाने के पश्चात बच्चों को कुछ रुपये व मक्का की फुलियां, रेवड़ी इत्यादि भी दी जाती हैं। गीत कुछ इस प्रकार से गाया जाता है -

हुली  नी  माये  हुले।  दो बेरी  पत्थर  टुल्ले॥ 

दो दिल पईयां खजूरां  खजूरां सुटियां मेवा ।

 इस       नब्बी       दा      करो    मंगेवा ॥

 

लोहड़ी की कथा

 मुगल काल में अकबर के जमाने में एक विख्यात डाकू दुल्ला भट्टी था, जो अत्यंत ही नेक दिल इंसान था। वह सदैव गरीबों की भलाई करता था, अमीरों को वह हमेशा लूटता था व जरूरतमंद गरीबों की मदद करता था। अकबर ने इस डाकू को पकडऩे के सारे प्रयास किये थे, लेकिन गह गरीबों का हमजोली था, इसलिए सदैव बच निकलता था। लोग उसे अपने घर में छिपा लिया करते थे। एक बार एक गरीब ब्राह्मïण की लड़की जिसका नाम ‘सुंदर मुंदरिये’ था जब उसकी शादी करने का वक्त आया तो गरीब ब्राह्मण ने दुल्ला भट्टी डाकू से फरियाद की। दुल्ला भट्टी चूंकि मुस्लिम था, लेकिन वह दिल में कभी भेदभाव नहीं रखता था। जब वह ब्राह्मण के घर आया तो उसने देखा कि लड़की का कोई भाई नहीं है, तो वह सुंदर मुंदरिये का भाई बन गया। वह घर के लोगों को वचन दे गया कि वह सुंदर की शादी में जरूर आएगा व पूरी मदद करेगा। यह वचन पाकर ब्राह्मण निश्चिंत हो गया। लेकिन, यह खबर जब अकबर बादशाह तक पहुंची कि सुंदर मुंदरिये की शादी में दुल्ला भट्टी आएगा तो बादशाह ने शादी के दिन सब तरफ चौकसी बढ़ा दी व सैनिक तैनात कर दिये। इधर, ब्राह्मण को चिंता होने लगी, किंतु शादी के दिन वादे के अनुसार अपनी बहन की शादी में दुल्ला भट्टी आया। कहा जाता है कि अपने साथ में ढेरों शादी के साजो सामान, चुन्नियां, कपड़े व जेवरात भी लाया। यहां तक कि वह साथ में सौ मन शक्कर भी गाड़ी पर लदवाकर लाया। शादी पूरी रस्म-रिवाज के साथ संपन्न हुई और जब सुंदर मुंदरिये की विदाई का समय आया तो उसे डोली में बिठाकर बारातियों को देने के लिए साथ में लायी शक्कर को अपनी शाल में भरकर सामने कर दिया, जिसके बोझ से शाल फट गयी। खैर! विदाई के बाद अकबर के सिपाहियों ने डाकू दुल्ला भट्टी को चारों ओर से घेर लिया। दोनों ओर जमकर लड़ाई हुई और अंत में दुल्ला भट्टी मारा गया।

तब से यह घटना प्रेम व भाईचारे का प्रतीक बन गयी कि दुल्ले ने अपनी बहन की शादी में जान तक दे दी और तब से लेकर आज तक इस प्रसंग के परिप्रेक्ष्य में लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है व दुल्ला भट्टी की याद में यह गीत बड़े जोर-शोर व आदर के साथ गाया जाता है।

 सुंदर-मुंदरिये,   हो ।    तेरा   कौन    बैचारा,  हो ।

 दुल्ला   भट्टी  वाला,  हो ।  शेर  शक्कर  पाई,  हो।

कुड़ी  दे बोझे पाई, हो। कुडणी दा लाल पताका, हो।

कुड़ी  दा  सालु  पाटा  हो,  सालू  कौन  समेटे,  हो ।

Deepavali (दीपावली)

Happy Diwali

दीवापली के मौके पर महालक्ष्मी और गणेश की पूजा का विशेष महत्व है | पूजन के बाद लक्ष्मी जी की आरती करना न भूलें।

ऊँ महालक्ष्म्यै नम:

अहोई अष्टमी कथा / अहोई माता व्रत / अहोई माता की आरती – Ahoi Ashtami

करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का व्रत किया जाता है। यह व्रत पुत्र की लम्बी आयु और सुखमय जीवन की कामना के लिये किया जाता है.

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अहोई माता की आरती - Ahoi Ashtami Aarti

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करवा चौथ का त्योहार – Festival of Kurva Chauth

करवा चौथ पति-पत्नी के अमर प्रेम का प्रतीक है। सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दिर्घायु के लिए यह व्रत रखती है। इस व्रत में विवाहित स्त्रियों को दिनभर निराहार तथा निर्जला  रहना पड़ता है। करवाचौथ का त्यौहार महिलाओं के लिए सजने और संवरने का दिन होता है।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवाचौथ का व्रत मनाया जाता है।

पति की लंबी उम्र की कामना के साथ करवा चौथ का पर्व सुहागिनों ने श्रद्धा और उल्लास के साथ परंपरागत तरीके से मनाया जाता है।

 चन्द्रमा को देखकर अर्ध्य देते है फिर भोजन करते है।

Festival of KarwaChauth

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शरद पूर्णिमा (Sharad Poornima)

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। साल की अनेक पूर्णिमाओं में शरद पूर्णिमा का अलग ही महत्व है |  ज्योतिष की मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है। वर्षा ऋतू के बाद जाड़े की शुरुआत में शरद की ऋतू की इस पूर्णिमा के दिन चाँद से अमृत बरसता है।  इसे ‘रास पूर्णिमा’ भीकहा जाता हैं। इस दिन ‘कोजागर व्रत’ भी माना गया है। इस को ‘कौमुदी व्रत’ भी कहते हैं। इस दिन प्रात: काल स्नान करके आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषणों से सुशोभित करके आवाहन, आसान, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, सुपारी, दक्षिणा आदि से उनका पूजन करना चाहिए। इस दिन रात्रि के समय गाय के दूध और चावल की खीर बनाकर चाँद की किरणों के नीचे रख दी जाती है और समझा जाता है की ओस की बूंदों के साथ चाँद से बरसा हुआ अमृत खीर में आ जायेगा | दूसरे दिन उसका भोजन करें तथा सबको उसका प्रसाद दें।  विवाह होने के बाद पूर्णिमा के व्रत का नियम शरद पूर्णिमा से लेना चाहिए।  यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ, राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है।

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